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बादल रोया (हाइकु) / जगदीश व्योम

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1
बादल रोया
धरती भी उमगी
फसल उगी।
2
क्यों तू उदास
दूब अभी है ज़िंदा
पिक कूकेगा।
3
इर्द गिर्द हैं
साँसों की ये मशीने
इंसान कहाँ !
4
कुछ कम हो
शायद ये कुहासा
यही प्रत्याशा ।
5
सहम गई
फुदकती गौरैया
शुभ नहीं ये।
6
धूप के पाँव
थके अनमने से
बैठे सहमे।
7
लोक रोपता
महाकाव्य की पौध
लुनता कवि।
8
स्वागत हुआ
दूब-धान है आया
लोक जीवन ।
9
मरने न दो
परंपराएँ कभी
बचोगे तभी।