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बाबनाभूत / गजानन मिश्र / दिनेश कुमार माली

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रचनाकार: गजानन मिश्र

जन्मस्थान: तपोवन, टिटिलागढ़,बोलांगीर

कविता संग्रह: सर्वनाम,नथिबा चित्र,स्टेशन,कविताघर,गोटापणे,चेरैवेति,बाहुड़ा,काल काल,नाब,अमृत सबु,अहर्निशि, महारेखा


सर्वत्र घूमता है।
कहाँ रहेगा ? किसके घर में ?

योजन- योजन दूर से
चंद्र और सूर्य को निरखते
बैठे रहता है
बरगद के पेड़ के
फैले अंधेरे में या
सेमल-पेड़ के लाल- लाल फूल
लेकर अन्दर आता है वह
ईमली-पेड़ की टहनी से
सीखाना होगा उसे उचित व्यवहार

किसका घर ? मंदिर की पताका ?
समुद्री ज्वार-भाटा  ?
धूल धुसरित होकर वापस
रास्ते के बीच में खड़ा है
बंधु परिजनों से मिलकर कहने के लिए
जीवन का भग्नांश बल्कि
उस समय नहीं था, न होगा
क्रियाकर्म करके
इधर -उधर
लौट जाता है कहीं वह
सर्वप्रथम और सर्वशेष राष्ट्रदूत की तरह ।

उसका कोई और परिचय
नहीं है .
युद्ध-समाप्ति के भग्नावशेष में
खोजता है वह स्नेह, प्रेम भाव का
अपूर्व मिश्रण
शत्रु-मित्र का .

शून्य आकाश किसलिए
बुलाता है मुसकराते हुए
जब तक नया जीवन रहेगा
हरे संकेत लेकर धीमे पांवों से
चलता है वह मिट्टी में आगे-आगे ।

पड़ी हुई हरी घास रख पाएगी
मखमली कीड़ों का एकाधिपत्य ?
खड़ा रह जाता है चौराहे पर
पत्थर होकर आग्नेय कोण में
अदृश्य दिशा में जाते- जाते !