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बाल कविताएँ / भाग 13 / रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

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जब सूरज जग जाता है

आँखें मलकर धीरे-धीरे

सूरज जब जग जाता है ।

सिर पर रखकर पाँव अँधेरा

चुपके से भग जाता है ।

हौले से मुस्कान बिखेरी

पात सुनहरे हो जाते ।

डाली-डाली फुदक-फुदक कर

सारे पंछी हैं गाते ।

थाल भरे मोती ले करके

धरती स्वागत करती है ।

नटखट किरणें वन-उपवन में

खूब चौंकड़ी भरती हैं ।

कल-कल बहती हुई नदी में

सूरज खूब नहाता है

कभी तैरता है लहरों पर

डुबकी कभी लगाता है ।