भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

बिंत-ए-लमहात / अख़्तर-उल-ईमान

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तुम्हारे लहजे में जो गर्मी-ओ-हलावत[1] है
इसे भला सा कोई नाम दो वफ़ा की जगह
गनीम[2]-ए-नूर का हमला कहो अँधेरों पर
दयार-ए-दर्द में आमद[3] कहो मसीहा की
रवाँ-दवाँ[4] हुए ख़ुशबू के क़ाफ़िले हर सू
ख़ला-ए-सुबह[5] में गूँजी सहर की शहनाई
ये एक कोहरा सा ये धुँध सी जो छाई है
इस इल्तहाब[6] में सुर्मगीं[7] उजाले में
सिवा तुम्हारे मुझे कुछ नज़र नहीं आता
हयात नाम है यादों का तल्ख़ और शीरीं
भला किसी ने कभी रन्ग-ओ-बू को पकड़ा है
शफ़क़[8] को क़ैद में रखा सबा को बन्द किया
हर एक लमहा गुरेज़ाँ[9] है जैसे दुश्मन है
न तुम मिलोगी न मैं हम भी दोनों लम्हे हैं
वो लम्हें जाके जो वापस कभी नहीं आते


उर्दू से लिप्यंतर : लीना नियाज

शब्दार्थ
  1. मिठास, आत्मीयता
  2. दुश्मन
  3. आगमन
  4. फैली हुई, बिखरी हुई
  5. सुबह की शान्ति
  6. उदासीनता, निराशा
  7. सुरमई
  8. झुटपुटा
  9. भागना, पलायन करना