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बिके हाट में / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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16
पीछा न छोड़ें
गर्दिशें चली आईं
मुँह नहीं ये मोड़ें,
गिरे बारहा,
न हम हार माने
न वे माँगें जुदाई।
17
बिके हाट में
वे साधु-सन्त ज्ञानी
जो लगाए मुखौटे,
हम न बिके
भले दो कौड़ी के थे
सिर ताने खड़े थे।
18
बीता जीवन
न पहचाना हमें
न कभी जाना हमें,
बदली राहें,
अलग है दिशाएँ
अब मिल न पाएँ।
19
दूर सागर
लेके खाली गागर
भरने चले हम,
बाँटी हमने
हर बूँद पथ में
जो सागर से पाई.
20
हम क्या करें!
दुआएँ बेअसर
भटके रात-दिन,
जहाँ भी रुके,
गरम आँसुओं से
दर गीला मिला था।