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बिटिया की गुल्लक / हरीश करमचंदाणी

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जरूरत के मजबूर और बुरे दिनों में
फोडी गयी गुल्लक
इस वादे के साथ
कि नयी गुल्लक भर दी जायेगी
पहली तारीख को
तब से हर महीने पहली तारीख तो आती है
पर गुल्लक खाली ही रह जाती है
जरूरतें गुल्लक से कहीं बड़ी जो हैं
हर बार शर्मिंदा पिता
पूछते हैं
दुलार से
कातर भाव से
बिटिया, क्या तुम्हारे पास थी बस एक ही गुल्लक