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बिहारी होने का गर्व / अनुपम कुमार

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अब बिहारी होने का मुझे
कोई ख़ास गर्व नहीं होता
हाँ! भारतीय होने का गर्व
बचा है मुझमें अभी तक
मुझे मनुष्य होने का गर्व है
पर ईश्वर की संतान होने का
जितना गर्व करूँ, कम है
    
बिहारी होने का गर्व
न होने के कुछ कारण हैं
ऐसा नहीं है कि
ये बस यूँ ही अकारण है
अब जान गया हूँ मैं
बिहार संज्ञा नहीं रहा
विशेषण बन गया हैं
जहाँ-जहाँ भी लूट है
अपनों को छूट है
जाति का कालकूट है
तलवार नहीं मूंठ है
पेड़ नहीं ठूंठ है
भ्रष्टाचार कूट-कूट है
  जहाँ कूट-नीति की मार है
युवा जहाँ बेकार है
जहाँ प्रतिभा भरमार है
बैल को खर-पतवार है
और बकरी को अचार है
वोट की टूटी पतवार है
मज़हब की कटार है
अस्मत तार-तार है
शिक्षा हुई मझधार है
पार्टियों में ख़ुमार है
वहाँ-वहाँ तो एक बिहार है
सोचिये कहाँ-कहाँ बिहार है
अब सोचिये कहाँ-कहाँ बिहार है
जब ऐसे ही हों हालात
तो गर्व की क्या बात