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बीता जीवन / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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31
बीता जीवन
कभी घने बीहड़
कभी किसी बस्ती में
काँटे भी सहे
कभी फ़ाके भी किए
पर रहे मस्ती में।
32
हज़ारों मिले
पथ में मीत हमें
चुपके से खिसके
तुम-सा न था
साथ निभाने वाला
लौटके आने वाला।
33
लो शाम हुई
भोर के स्वप्न मरे
दोपहर रो पड़ी,
प्यार खो गया
धूल भरी आँधियाँ।
नीड तोड़ती गई।
 [कैनेडा-3-40 अपराह्न-24 जुलाई-2014; भारतीय समय: 25 जुलाई पूर्वाह्न 1-10 बजे, माता जी की मृत्यु से 10 मिनट पहले]
34
मूक है वाणी
कि न पार पाते है
शब्द हार जाते हैं,
जब तुम्हारा
नभ-जैसा निर्मल
हम प्यार पाते हैं।
35
जन्मों की यात्रा-
कि साथ रही होंगी
सुधियाँ मधु-भरीं,
आज के दिन
कौन से पुण्य पाए
हमें पास ले आए.