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बुद्धि के बढ़ती / धरीक्षण मिश्र

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दोसरा के घर जरा के हाथ के सेंकले न बा ।
के आन का शुभ कीर्ति पर कीचड़ कबें फेंकले न बा ॥
कहें हीरा चन्द ओझा[1] चन्द कवि पृथिराज का -
दरबार में रहले कहीं इतिहास में लिखले न बा ।
सन और सम्बत झूठ बा घटना सजी बेमेल बा
साँच कवनों बात रासों में कहीं बटले न बा ।
का साँच बा का झूठ बा ई के इहाँ निर्णय करो
जब कि ओ पृथिराज के दरबार केहु देखले न बा ।
एक बात जरूर बा हम कहबि ढोल बजाइ के
आजु ले ओझा कहीं केहु साँच कुछ भखले न बा।
आचार्य केशव दास पर बड़थ्वाल[2] जी बानीं भिड़ल
मानों इहाँ खातिर कहीं मजमून कुछ अँटले न बा ।
शुक्ल जी[3] लिखनीं कि केशव का रहे ना कवि हृदय
जे जौन चाहो कहो तवने मुँह केहू छेंकले न बा।

शब्दार्थ
  1. प्रख्यात इतिहासकार महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा
  2. डॉ० पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल -- कबीर के सुख्यात शोधकर्ता
  3. आचार्य पण्डित रामचन्द्र शुक्ल