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बुलंदी हो बुलंदी-सी तो ये मशहूर करती है / दरवेश भारती

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बुलंदी हो बुलंदी-सी तो ये मशहूर करती है
अगर हद से ज़ियादा हो तो ये मग़रूर करती है

सुहाने ख़्वाब हो और वो भी हों ता'बीर से भरपूर
यही दौलत है वो जो नींद तक काफूर करती है

नहीं है होश में फिर भी वो उठ-उठकर है चिल्लाता
है कुछ तो बात जो इसपर उसे मजबूर कस्ती है

मेरी औक़ात से बढ़कर मुझे देना न कुछ मालिक
ज़रूरत से ज़ियादा रौशनी बेनूर करती है

इसे लेने में कोताही न हरगिज़ कीजिये साहिब
बुज़ुर्गों की दुआ ही हर बला को दूर करती है

जहाँ तक हो सके इससे बनाकर फ़ासिला रखिये
अना ही हर बशर के ख़्वाब चकनाचूर करती है

झुकी रहती हैं नज़रें उम्र-भर के वास्ते 'दरवेश'
कि ये एहसानमंदी इसक़दर मशकूर करती है