बेला का शर्बत / मानिक बच्छावत

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बेला के फूलों में
एक मीठी-मीठी मादक महक होती है
जो मन को बहुत आंदोलित करती है
पर ऐसा कभी नहीं सोचा था कि
इसका अरक निकालकर एक बहुत
उम्दा पेय शर्बत बनाया जा सकता है
पर इस करिश्मे को अंजाम दिया
इस शहर के बाशिंदे चुन्नीलाल तंवर ने
उन्होंने इस बेहतरीन शर्बत को बनाकर
जब लोगों को अपनी पान की
दुकान से कुल्हड़ में ढालकर
पिलाया तो सबका मन मोह लिया
अपने इस ईजाद से उसका नाम
शहर में फैल गया लोग उसकी
दुकान पर उमड़ने लगे और
उसके हाथ से बने शर्बत का
जायका लेने लगे, चुन्नीलाल जी
की इस दुकान पर शहर के
बुध्दिजीवियों का भी अङ्ढा जमने लगा
एक दिन मैं भी उनकी दुकान पर
शर्बत पीने पहुंच गया, खाकी रंग का
हाफ पैंट पहने चुन्नीलाल जी ने शर्बत को
उथल-पुथल कर मुझे शर्बत दिया
मेरा ऐसा शर्बत
पीने का पहला अनुभव था सोचा
यहां से जाते वक्त में क्यों न
दो तीन बोतलें शर्बत की साथ
ले जाऊं पर उन्होंने कहा कि मुझे
तीन चार दिन का वक्त दीजिए
शर्बत इतनी मात्रा में तैयार
करना आसान नहीं है, वे चाहते तो
अपनी प्रसिध्दि का व्यापारिक लाभ
उठा सकते थे, असेंस डाल कर
सैकड़ों बोतलें भर कर बेचकर
बड़ा मुनाफा कमा सकते थे पर वे
ऐसा करने को तैयार नहीं थे
आज वे नहीं हैं पर दुकान चल रही है
लोग प्राय: शाम को
वहां शर्बत पीने जमा होते हैं
उनका फार्मूला उनके पुत्र-पौत्र
अपनाकर ग्राहकों को बांधे हुए हैं।

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