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बैखस की स्तुति में / अलेक्सान्दर पूश्किन

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 ’बैखस’ सुरा के देवता का नाम है

शान्त क्यों उत्सव आनन्द के स्वर?
हमारे देवता बैखस के गान गाओ !
जुग-जुग जियो, कुवाँरियो और महिलाओ,
ओ प्यारी सुन्दरियो, जिनने पूरे मन से अपना प्यार लुटाया !

पियो दोस्तो, पियो ख़ूब तबीयत से और स्वाद ले ले !
जैसे मैं करता हूँ
तुम भी, मदिरा प्याले के संग,
छककर प्यार करो जो तुम कब से चाहते हो!
आओ अपने प्याले खनकाएँ और जाम ऊँचे उठाएँ

कला की देवी की जय ! बुद्धि की देवी की जय!
उनकी प्रशंसा के गीत गाओ!
तुम प्रतिभा के सूर्य, चमकते रहो—
जैसे इस प्राचीन दीये की आभा मन्द हो जाती
भोर के आगमन से,
मिथ्या बुद्धि का रंग वैसे ही फीका पड़ जाता
सद्विवेक के अमर प्रकाश में...

जियो चमकते दिन ! ख़त्म, अन्धेरी रात!

1825

अँग्रेज़ी से अनुवाद : शंकर शरण