भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

भरी-भरी मूँगिया हथेली पर / माहेश्वर तिवारी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

भरी-भरी मूँगिया हथेली पर
लिखने दो एक शाम और !

काँपकर ठहरने दो
भरे हुए ताल
इन्द्र धनुष को
बन जाने दो रुमाल
सांसों तक आने दो
आमों के बौर !

झरने दो यह फैली
धूप की थकान
बाँहों में कसने दो
याद के सिवान
कस्तूरी आमन्त्रण जड़े
ठौर-ठौर !