भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार
Roman

भीतर तक छिलता रहा / सांवर दइया

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

न जाने कितनी उमंगें लेकर
पहरों बतियाने की सोच
आया था मैं द्वार तिहारे

मिले, मुस्कुरायें, बैठे
पर बतियाये नहीं

जितने पल बीते
सब रीते
रीते-रीते वे पल
दे सके कोई हल ?

जब तक रहा
भीतर तक छिलता रहा
तुम्हारी चुप्पी के चाकू से !