भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  काव्य मोती
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

भीतर बैठें तो नश्तर-सी यादें होती हैं / सांवर दइया

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

भीतर बैठें तो नश्तर-सी यादें होती हैं।
बाहर निकलते ही अब वारदातें होती हैं!

जलसे सजते हैं यहां, हम वे रू-ब-रू हों,
कैसे मिले, जब बीच तनी कनातें होती हैं!

उनकी हमारी मुहब्बत का है यह रूप नया,
जहां मिलें, पत्थरों से मुलाकातें होती हैं!

जिस दिन से शुरू किया खेल अंगारों का, सुना है-
उनकी बज्म में अब हमारी बातें होती हैं!
 
सूरज हां भरे आने की, और फिर भोर न हो,
बता, ऐसी कौन-सी काली रात होती हैं?