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भूख हड़ताल के पाँचवे दिन / नाज़िम हिक़मत

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मुखपृष्ठ  » रचनाकारों की सूची  » रचनाकार: नाज़िम हिक़मत  » भूख हड़ताल के पाँचवे दिन

मैं जो बात कर रहा हूँ
ख़ुद जाकर तुमसे जो न कह सकूँ
भाई! तुम मुझे दोष मत देना।
मेरे बाल सफ़ेद हो चले हैं
सिर थोड़ा-थोड़ा काँपता है
नशे की वजह से नहीं
ये इतनी.... इतनी-सी, ज़रा-सी भूख से।

भाई,
तुम लोग जो यूरोप के हो
      जो एशिया के
      जो लोग अमेरिका के हो...
मैं जेल में भी नहीं
भूख हड़ताली भी मैं नहीं
आज इस मई के महीने में

लेटा हूँ घास पर --
      अब रात है
मेरे सिरहाने तुम लोगों की आँखें
नक्षत्रों की तरह जल रही हैं।

मेरे हाथ में हैं तुम्हारे हाथ
जैसे मेरी जननी का
जैसे मेरी प्रियतमा का
जैसे जीवन का।

मेरे भाई
दूर रहकर भी तुम लोग
मुझे छोड़कर कभी नहीं गए,
न मुझे, न मेरे देश को
न ही मेरे देश के लोगों को।
जैसे मैं तुम लोगों से प्यार करता हूँ

वैसे ही तुम लोग -- जो कुछ मेरा ख़ुद का है --
उससे प्यार करते हो।
मेरा धन्यवाद स्वीकार करो भाई
धन्यवाद

मैं मरना नहीं चाहता
अगर मेरी हत्या होती है
तो भी तुम्हारे बीच बचा रहूँगा
मैं जानता हूँ।

अरागाँ की कविता में मैं रहूँगा --
जिस कविता में है मधुमय आगामी दिन की स्तवगाथा।
पिकासो के सफ़ेद कबूतरों में रहूँगा मैं
रॉब्सन के गीतों में
मैं रहूँगा और भी रमणीय होकर
फैल जाऊँगा समूची पृथ्वी पर
साथी योद्धा की हँसी में रहूँगा
रहूँगा मर्साई के डॉक-मज़दूरों के सीनों में।

बिना किसी कपट के कह रहा हूँ, भाई --
मैं सुखी हूँ
नववधू की तरह सुखी।


अंग्रेज़ी से अनुवाद : उत्पल बैनर्जी