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भोजपुर के तेवर (कुँवर बावनी से) / भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव ‘भानु’

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पानी के मोल अमोल जहान में,
मान मिले ना बिना कुल-पानी।
कौड़ी के मोल बिकात बाजार में,
मोती फिरे उतरे पर पानी।
चानी समान जवानी के जोत के,
पूछे ना केहू बिना मुँह-पानी।
देस के जान जवान-जवानी ह,
जान-जवानी के “भानु” ह पानी।
मुंज-मुंजवान जहां वीर के बथान जहाँ,
आन-बान-सान हथियरवा लऊर ह।
कुंवर के गान जहाँ अमर के मान जहाँ,
तेगवा के तान लोग धुरिहा जरूर ह।
बाबा वरमेसर के बाटे पुन्न धाम जहाँ,
काशी बिश्वनाथ के दोसर सुरपुर है।
गंगा महरानी जहाँ सरजू के पानी जहाँ,
भोज के निशानी ‘भानु‘ इहे भोजपुर है।
गोरख के बानी विन्धयाचल भवानी जहाँ,
वीर के निशानी बाटे गढ़वा चुनार के।
गढ़ रोहतास ‘भानु‘ रौजा ससराँव वाला,
किला जौनपुर के जे गोमती किनार-के।
नोखा, जगदीशपुर गढ़ डुमरावं के ई,
वीर बानासुर के पोखरवा मस्सार के।
इहे भोजपुर हवे दान-वीर “बलि” जहाँ,
छले भगवान आइ छोट रूप धार के।
विश्वामित्र मानी जहाँ तेज ब्रह्मज्ञानी, धन,
गुरू,गुरू-दुअरा ह “राम-अवतार” के।
राजा-रानी धीर-वीर “मोरध्वज” देले चीर,
आरा से शरीर बेटा जीवन-अधार के।
बानभट्ट, कालीदास, दरिया, कबीर दास,
किन्ना आ रमेसर के गीत ग्यान-सारके।
इहे भोजपुर हटे जहाँ से बहल ‘भानु‘
मानस के धार हिन्दुवन के उद्धार के।
ताव ना सहेला ताव मोछ प रहेला देत,
नेत ना बिगारे काम करेला विचार के।
गाल ना बजावे ताल ठोकि के देखावे वीर,
झोंकि के चलेला महावीर जयकार के।
हेंकड़ी भुलाई देला गोल छितराई देला,
लाठी ले परेला जब ‘भानु‘ ललकार के।
पानी के मरद जिनगानी ना बुझेला चीज,
लाठी से उतारि लेला पानी-तरुआर के।
झूठ न बखाने जाने छूतछात माने जाने,
दीठ ना लगावे जाने आन के बहूरिया।
आन प लड़ावे जाने जान के ना जान जाने,
चलेके उतान जाने तान के लउरिया।
बानी मरदानी जाने चाल मसतानी ‘भानु‘
होला एक पानी के मरद भोजपुरिया।
ठाट ना बनावे जाने, काट ना कावे जाने
हाथ ना हिलावे चमकावे ना अंगुरिया।
बात ना बनावे जाने बात साफ-साफ जाने,
फटसेनी राँड़ ना त भर बाहें चुरिया।
हठ में हमीर महाबीर वीर लठ में जे,
बान्हे लटपट कनपटी ले पगरिया।
डाँटी के बनल “भानु” माटी के कसल उहे,
खाँटी ह जवान ऊमगल भोजपुरिया।
करेके तेजारत भ हुकम ले भारत में,
धीरे-धीरे मालिक गइल बनि जबरा।
ढाहे जुलुम खूबे लोग के सतावे लागल,
बोलला पर मारे मुँहे सटसट थपरा।
ढोइ-ढोइ धन इंगलैंड भेजवावे रोज,
काला-कूली कहि गरिआवे नीच हमरा।
कल्हुवे के बनिया गइल बनि सेठ आजु,
हेठ देखलावेख जानि लेले रहे अबरा।
सहल गइल ना जुलुम त बटोर कके,
“कुंवर-अमर” वीर बागी बनि गइले।
घर से खदेरे खती जुलुमी फिरंगिया के,
देले ललकार भोजपुर जुटि गइले।
लेके तलवार हाथ लठिया जवान साथ,
प्रन कके रन में अगाड़ी बढि़गइले।
छोडि़ घर-बार परिवार सुख-साज-बाज;
छेस के आजादी प शहीद होई गइले।
एरेवार ! कुँवर-अमर ले समर छोडि़,
शंका धरि धीर मोके म्यान से निकालू आज।
¬देखु छनभर में मचेला रन हाहाकार,
गोरन के सोस प गिरेला अरराके गाज।
छुवते-छुवत लीला नागिन समान चूसि,
बैरोन के खून जैसे लावा के चूसेला बाज।
बैरी बिचलाके चमकाके बिजुली के तेज,
बिरद बढ़ाके “भानु” राखि लीला तोर लाज।
साजि रन-साज-बाज बाजी लेले गाजत का ?
बाजी ले लगाई बाजी देखु जितवाइला।
वैरीन के दल-बल रौदंत ना लागी पल,
कालीजी के खाली “भानु” खप्पड़ भराइला।
आइल अभाग भाग फूटल फिरंगी के बा,
बचिहें ना भाग कहीं आग बरसाइल।
काली के समान बिकराली बनि गोरन के,
हाली-हाली कालीजी के बकरा बनाइल।
आइल फिरंगी दल जोमसे बढ़ल, काम,
कायम नगर मे परल बरियार से।
बाँये से “अमर” घेरे दहिने “निसान” सिंह,
सोझासे परल पाला “कुंवर” जुझार से।
गोरा कप्तान के चउकड़ी भुलाई गइल,
वीर भोजपुरीन के बम्बून के मार से।
तीनि-तीनि ओर से चढ़ाई कके बीनि लेले,
गीनि-गीनि गोरन के सीस तरुआर से।
उमरि गिरानी पानी चढ़ल जवानी, हाथ-
दहिना खड़ग नाचे ढाल नाचे बाँवा में।
मारिके समर पेंग बाँकुड़ा “कुवंर सिंह”
काटि-काटि गारन के भाठि देले खाँवा में।
ऐंड देत घोड़ा टाप प देत फिरे,
दँवरी बनाइ छोड़े ‘भानु‘ एक धावा में।
कालासे परल पाला चोला के परल लाला,
शेखी अंग्रेजन के उडि़ गइल हावा में।
मूँठ प परत हाथ ठूँठ देह साथ-साथ,
माथ बिनु गोरनके झाँके किरिस्तान के।
काटत दूबलगीके जंगल समान चले,
सोझा जे परल ना रहल मयदान के।
घुसिके समर बीच बाँकुरा “अमर” मारे-
सेख अंगरेजनके कोख तेग तान के।
“ओरे माई लौड”! क्हि गोरन के गोड़ छुटे,
भागे भहरात छछनत लेले जान के।
जीभ अस कालके निकलि करे लप्प-लप्प,
छप्प-छप्प छाँटि छीटे रन में फिरंगी के।
खाँड़ अस कालीके खुंखार बनि कच्च-कच्च,
काटि-काटि फेके मुंड गोरनके संगी के।
इन्द्र के बज्जर अस प्रलय लहर अस,
गदा-मुगदर अस वीर बजरंगी के।
“गमर” के तेग किदो खुलल धधकि रहे,
तीसर नयन “भानु” भोला अड़बंगी के।
“आयर” इलाहबाद जात रहे फौज लेके,
सुनिके घेराइल अंग्रेज बाड़े आरा में।
चलल लवटि बक्सर से बढि़ आरा ओर,
ताडाताड़ी फौज बरियार ले अन्हारा में।
बीचे गजराजगंज सेना रहे “कुंवर” के,
बीबीगंज बाजि उठल मारू नगारा में।
आधा से अधिक फौज कटल अंगेरजन के,
मुंड़ी लोंहड़ात चले रकत के धारा में।
घेरले सिपाही जे रहन “आरा हाउस” के,
सकले ना रोकि धावा “आयर” तूफानी के।
लेलस छोड़ाई अंगरेज जे रहन बन्द,
‘भानु‘ आरा-हाउस में बिना अन्न-पानी के
जीति जगदीशपुर बसल ले फौज जाइ,
“बाबू” निकलि गइले मारि सब रानी के।
“अमर-निसान” सिंह छिपले कैमूर में जा,
सालत करेज रहे मोह रजधानी के।
भइल सलाह सेना करेके जेयार फेर,
झँकले “कुंवर” जाई रीवाँ-दरबार के।
रीवाँ महाराज धाई गोदी में उठाइ लेले,
मदत मिल ‘भानु‘ चैदह हजार के।
रुकले महीना भर जाके “कालपी” में रहे-
आवे के गोआलियर से भारी गाहार के।
कालपी से चलिके चहुंपले जा कानपुर,
कान्त कानपुर हो गइल रहे हार के।
घुमिके उहाँ से दौड़ा कइले लखनऊ के,
अवध-नबाब के बतवले विचार के।
खिलत में आजमगढ़ जिला मिल औरु,
नगद मदत “भानु” सारह हजार के।
लड़ल फिरंगी-फौज हारके लुकाइल जा,
बन्द कके किलाके फाटक बरियार के।
आइल मदतमें जे दोसर “फउद” भारी,
काटि देले पूरा छीनि लेले हथियार के।
चलते चढ़ाई करे कसिके बनारस प,
फउज-फिरंगी देखि परले पलटि के।
पीछा गाजीपुर तक कइले, भइल तौले-
इच्छा जगदीशपुर देखेके लवटि के।
सोंचले फिरंगी कि करिहें पार बलिया में,
पकडि़ मलाह नाव फेंकले उलटि के।
तौले शिवपुर घाट सेनाले भइले पार,
सुनिके अंग्रेज धाई जुटले झपटि के।
सेना हो गइल पार रहे नाव “कुंवर” के,
अबहीं खेवात जात बीच गंगा-धार में।
गोली बीख बोरल घुसल आई बाँया हाथ,
काटि चट देले गंगा जी के उपहार में।
रहल “लीग्रैं ड” लेइसेना जगदीशपुर,
दिहले भगाई जाइ एके ललकार में।
भइल आजाद शाहाबाद ना रहल दुख,
परजा निहाल “भानु” बाबू सरकार में।
अमर-निसान सिंह जुद्ध गोरिला के जारी,
रखले रहन छिपि जंगल-पहाड़ी में।
जीत जगदीशपुर सुनिके धधाइ धाइ,
दगले सलामी आइ “कुंवर” अगाड़ी में।
भइले ऊपर घर अइले छिपल सब,
डरसे फिरंगिन के जाइ-जाई झाड़ी में।
डतसो अमंगसे मनावल गइल “भानु”,
खिलले सुमन घर-घर फुलवाड़ी में।
होते परात आई खुफिया खबर देलस,
जबर फिरंगी-फौज अगिया बैताल के।
आवत फौलादी बाटे लुटत आबादी के बा,
काटल कसाई अस लोग-बाग-माल के।
सुनि के उठल उर सोंच वीर “कुंवर” के,
बाँह ना रहल आजु गहेवाली ढाल के।
“अमर” अकेला परि जइहें समर बीच,
शंका हो उठल मन जीत के सवाल के।
तबले “अमर सिंह” दगले सलामी आई,
जरत नयन दूनों मानिंद मसाल के।
जियत “अमर” बाड़े अबहीं राउर भाई,
काई अस फारि दिहें सेना विकराल के।
माजा मिलि जाइ छन भ में चढि़ अइला के,
रन में बुझाई जाई भाव आटा-दाल के।
करीं अराम रवाँ बइठल चबाई पान,
छन में फिरंगी हवाले होइहें माल के।
मिलल हुकुम हूलि चलले अमर सिंह,
जाई दुलउर राह रोकले चढ़ाई के।
मचल घमासान सान, टुटल फिरंगी के,
आइल ना काम लेल ट्रेनिंग लड़ाई के।
बाज असटूटि लावा-लड्डू भकोसि गइले,
छनमें लुटाइल दोकान हलुआई के।
बाँवि दस-पाँच जात रहले करत बात-
“शाबस” लड़ाई केवा “कुंवर” के भाई के।
छिपले बिद्रोह घर-वार छोडि़ जंगल में,
रहल अलम ना, परल ओपोह में।
गइले अलोप होई “अमर-निसान” सिंह,
कैमूर पहाड़ी के केदली बन खोह में।
धोखा में शहीद होई गइले “निसान” सिंह,
बर प झूलस लास बान्हल बरोह में।
“अमर” अमर होई गइले सिलोन जाई,
“बौद्ध-महावीर” बनि बौद्ध के गरोह में।
छेस प निछावर करेके सुख-साजबाज,
भावना जगाई उर-उर मनभावनी।
पढ़ते-पढ़ते जोस रोष के उमंग भरी-,
मूरदो में जान वीर-रस बरसावनी।
बढ़ल भ्रस्टाचारी मनमानी महंगाई के,
रोग के दवाई दिहीं सूई-सनतावनी।
“कुंवर-अमर” बलिदान दे “निसान” सिंह,
पवल आजादी के दाही “कुंवर-बावनी”।