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भोर मेरी ही हँसी / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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91
शाम भी मेरी
भोर मेरी ही हँसी
तुम भी हँसो ।
92
प्रिय हो दूर
बेनूर है चेहरा
मन उदास ।
93
आँखें तरसें
अपलक तकतीं
सूनी है बाट ।
94
रंग है खोया
व्याकुलता ने बोया
कैसा ये बीज ।
95
मिलना दूर
तो मन सुमन का
खिलना दूर ।
96
हुआ बेरंग
जीवन का सफ़र
रंग भर दो ।
97
वासन्ती रूप
ले मन में बसना
आज के दिन ।
98
सँजोए काँटे
रूप और खुशबू:
जग को बाँटे।
99
तुम्हारा रूप
मंदिर में पावन
जलती धूप
100
भाव-तरंग
छलकी चेहरे पे
नई उमंग।
101
व्याकुल प्राण
जब देखा तुमको
मिला है त्राण।
102
चाह इतनी
अन्तिम साँसें जब
तुम हो पास।
103
तुम्हारी साँसें
मलयानिल भीगा
 भोर समीर ।
104
तुम्हारे नैन
जीवन उमंग का
भरे हैं नीर।
105
तेरा मिलना
शोख फूलों का मिल
जैसे खिलाना।