भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

मंच और मचान (लम्बी कविता) / केदारनाथ सिंह

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

उदय प्रकाश के लिए

                पत्तों की तरह बोलते
तने की तरह चुप
एक ठिगने से चीनी भिक्खु थे वे
जिन्हें उस जनपद के लोग कहते थे
चीना बाबा

कब आए थे रामाभार स्तूप पर
यह कोई नहीं जानता था
पर जानना ज़रूरी भी नहीं था
उनके लिए तो, बस, इतना ही बहुत था
कि वहाँ स्तूप पर खड़ा है
चिड़ियों से जगर-मगर एक युवा बरगद
बरगद पर मचान है
और मचान पर रहते हैं वे
जाने कितने समय से

अगर भूलता नहीं तो यह पिछली सदी के
पाँचवें दशक का कोई एक दिन था
जब सड़क की ओर से भोंपू की आवाज़ आई
"भाइयो और बहनो,
प्रधानमन्त्री आ रहे हैं स्तूप को देखने..."

प्रधानमन्त्री !
खिल गए लोग
जैसे कुछ मिल गया हो सुबह-सुबह
पर कैसी विडम्बना
कि वे जो लोग थे
सिर्फ़ नेहरू को जानते थे
प्रधानमन्त्री को नहीं !

सो इस शब्द के अर्थ तक पहुँचने में
उन्हें काफ़ी दिक़्क़त हुई
फिर भी सुर्ती मलते और बोलते-बतियाते
पहुँच ही गए वे वहाँ तक
कहाँ तक ?
यह कहना मुश्किल है

कहते हैं — प्रधानमन्त्री आए
उन्होंने चारों ओर घूम कर देखा स्तूप को
फिर देखा बरगद को
जो खड़ा था स्तूप पर

पर, न जाने क्यों
वे हो गए उदास
(और कहते हैं — नेहरू अक्सर
उदास हो जाते थे)
फिर जाते जाते एक अधिकारी को
पास बुलाया
कहा — देखो, उस बरगद को गौर से देखो
उसके बोझ से टूटकर
गिर सकता है स्तूप
इसलिए हुक़्म है कि देशहित में
काट डालो बरगद
और बचा लो स्तूप को

यह राष्ट्र के भव्यतम मँच का आदेश था
जाने-अनजाने एक मचान के विरुद्ध
इस तरह उस दिन एक अद्भुत घटना घटी
भारत के इतिहास में
कि मँच और मचान
यानी एक ही शब्द के लम्बे इतिहास के
दोनों ओर-छोर
अचानक आ गए आमने सामने

अगले दिन
सूर्य के घण्टे की पहली चोट के साथ
स्तूप पर आ गए —
बढ़ई
मजूर
इंजीनियर
कारीगर
आ गए लोग दूर-दूर से

इधर अधिकारी परेशान
क्योंकि उन्हें पता था
ख़ाली नहीं है बरगद
कि उस पर एक मचान है
और मचान भी ख़ाली नहीं
क्योंकि उस पर रहता है एक आदमी
और ख़ाली नहीं आदमी भी
क्योंकि वह ज़िन्दा है
और बोल सकता है

क्या किया जाय ?
हुक़्म दिल्ली का
और समस्या जटिल
देर तक खड़े-खड़े सोचते रहे वे
कि सहसा किसी एक ने
हाथ उठा प्रार्थना की —
"चीना बाबा,
ओ ओ चीना बाबा !
नीचे उतर आओ
बरगद काटा जाएगा"
"काटा जाएगा ?
क्यों ? लेकिन क्यों ?"
जैसे पत्तों से फूट कर जड़ों की आवाज़ आई

"ऊपर का आदेश है — "
नीचे से उतर गया

"तो शुनो," — भिक्खु अपनी चीनी गमक वाली
हिन्दी में बोला,
'चाये काट डालो मुझी को
उतरूँगा नईं
ये मेरा घर है !"

भिक्खु की आवाज़ में
बरगद के पत्तों के दूध का बल था

अब अधिकारियों के सामने
एक विकट सवाल था — एकदम अभूतपूर्व
पेड़ है कि घर ...
यह एक ऐसा सवाल था
जिस पर कानून चुप था
इस पर तो कविताएँ भी चुप हैं
एक कविता प्रेमी अधिकारी ने
धीरे से टिप्पणी की

देर तक
दूर तक जब कुछ नहीं सूझा
तो अधिकारियों ने राज्य के उच्चतम
अधिकारी से सम्पर्क किया
और गहन छानबीन के बाद पाया गया —
मामला भिक्खु के चीवर-सा
बरगद की लम्बी बरोहों से उलझ गया है
हारकर पाछकर अन्ततः तय हुआ
दिल्ली से पूछा जाए

और कहते हैं —
दिल्ली को कुछ भी याद नहीं था
न हुक़्म
न बरगद
न दिन
न तारीख़
कुछ भी — कुछ भी याद ही नहीं था

पर जब परत-दर-परत
इधर से बताई गई स्थिति की गम्भीरता
और उधर लगा कि अब भिक्खु का घर
यानी वह युवा बरगद
कुल्हाड़े की धार से, बस, कुछ मिनट दूर है
तो ख़याल है कि दिल्ली ने जल्दी-जल्दी
दूत के जरिए बीजिंग से बात की
इस हल्की सी उम्मीद में कि शायद
कोई रास्ता निकल आए
एक कयास यह भी
कि बात शायद माओ की मेज तक गई

अब यह कितना सही है
कितना ग़लत
साक्ष्य नहीं कोई कि जाँच सकूँ इसे
पर मेरा मन कहता है — काश ! यह सच हो
कि उस दिन
विश्व में पहली बार दो राष्ट्रों ने
एक पेड़ के बारे में बातचीत की

                — तो पाठकगण
यह रहा एक धुन्धला सा प्रिण्ट आउट
उन लोगों की स्मृति का
जिन्हें मैंने खो दिया था बरसों पहले

और छपते-छपते इतना और
कि हुक़्म की तामील तो होनी ही थी
सो जैसे-तैसे पुलिस के द्वारा
बरगद से नीचे उतारा गया भिक्खु को
और हाथ उठाए — मानो पूरे ब्रह्माण्ड में
चिल्लाता रहा वह —
"घर है...ये...ये....मेरा घर है'

पर जो भी हो
अब मौके पर मौजूद टाँगों-कुल्हाड़ों का
रास्ता साफ़ था
एक हल्का सा इशारा और ठक्‌ ...ठक्‌
गिरने लगे वे बरगद की जड़ पर
पहली चोट के बाद ऐसा लगा
जैसे लोहे ने झुककर
पेड़ से कहा हो — "माफ़ करना, भाई,
कुछ हुक़्म ही ऐसा है"
और ठक्‌ ठक्‌ गिरने लगा उसी तरह
उधर फैलती जा रही थी हवा में
युवा बरगद के कटने की एक कच्ची गन्ध
और "नहीं...नहीं..."
कहीं से विरोध में आती थी एक बुढ़िया की आवाज़
और अगली ठक्‌ के नीचे दब जाती थी
जाने कितनी चहचह
कितने पर
कितनी गाथाएँ
कितने जातक
दब जाते थे हर ठक्‌ के नीचे
चलता रहा वह विकट संगीत
जाने कितनी देर तक

— कि अचानक
जड़ों के भीतर एक कड़क सी हुई
और लोगों ने देखा कि चीख़ न पुकार
बस, झूमता-झामता एक शाहाना अन्दाज़ में
अरअराकर गिर पड़ा समूचा बरगद
सिर्फ 'घर' — वह शब्द
देर तक उसी तरह
टँगा रहा हवा में

तब से कितना समय बीता
मैंने कितने शहर नापे
कितने घर बदले
और हैरान हूँ मुझे लग गया इतना समय
इस सच तक पहुँचने में
कि उस तरह देखो
तो हुक़्म कोई नहीं
पर घर जहाँ भी है
उसी तरह टँगा है ।