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मंज़र को किसी तरह बदलने के लिए दुआ दे / शीन काफ़ निज़ाम

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मंज़र को किसी तरह बदलने की दुआ दे
दे रात की ठंडक को पिघलने की दुआ दे

ऐ साअते वीरान के बेख़्वाब फ़रिश्ते
अब चीख़ को सीने से निकलने के दिया दे

पत्ते को परिंदों की पनाहों प' लगा दे
पेड़ों को यहाँ फूलने फलने की दुआ दे

पढ़ ऐसा वज़ीफा कि ये कुहसार न उजड़ें
चश्मों को पहाड़ों से उबलने की दुआ दे

अब तोड़ तकानों के तकल्लुफ़ से तअल्लुक
पज़मुर्दा तबीयत को फिसलने की दुआ दे

आफ़ाक़ की दीवारों की आगोश को वा कर
अब मत्ल-ऐ-मोहूम को खुलने की दुआ दे

हम भूल ही जाएँ न कहीं शक्ल सहर की
अब शब को किसी तौर से ढलने की दुआ दे