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मछली बन कर / रित्सुको कवाबाता

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मुखपृष्ठ  » रचनाकारों की सूची  » रचनाकार: रित्सुको कवाबाता  » मछली बन कर

मैं लगाती हूँ मत्स्यासन योगाभ्यास में
लेट पीठ के बल
तान कर शरीर.
सिरे मेरी टांगों के
हैं पूंछ और पंख मछली के .
में मोड़ती हूँ बाहें ,
मेरे उँगलियों के पोर हैं आगे के पंख
झुकते हुए पीछे ठोड़ी उठा ऊपर .
छूता है मेरे सर का केंद्र
धरती को .
अकस्मात
देख सकती हूँ पीछे .
"अहा ,मैं देख सकती हूँ आगे .."
अनजाने ही मैं बन जाती हूँ मछली
तैरती फिरती नदी में .
मेरा सर घूमता है फुर्ती से
आगे बढ़ता सरलता से .
मैं हिलाती हूँ अपनी दुम और पंख
बढ़ते हुए आगे तेजी से .
लहराओ दायाँ पंख,मुढ़ जाओ बाएं .
पानी से होकर आता प्रकाश
झिलमिला कर नाचता है .
एक चिढिया उड़ बैठती है पेड़ पर
वह घूरती है नदी में .
ओ ! वह देख रही है मुझे !
मैं तैर जाती हूँ अँधेरे में .
पानी में उगे पोधों के नीचे डर कर .
कोई देख रहा है नीचे ..
मुझे पानी के अन्दर ..
मुझे लगता है जीना धरती पर
बेहतर है जीने से पानी मैं .
पंख बन जाते हैं फिर से हाथ-पैर ,
और खड़े होकर
मैं बढ़ाती हूँ कदम सशक्त .

यह अद्भुत है -
मैं हूँ एक मानव

अनुवादक: मंजुला सक्सेना