भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

मसरूफ़ियत उसी की है फ़ुर्सत उसी की है / रेहाना रूही

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मसरूफ़ियत उसी की है फ़ुर्सत उसी की है
इस सरज़मीन-ए-दिल पे हुकूमत उसी की है

मिलता है वो भी तर्क-ए-तअल्लुक़ के बावजूद
मैं क्या करूँ कि मुझ को भी आदत उसी की है

जो उम्र उस के साथ गुज़ारी उसी की थी
बाक़ी जो बच गई है मसाफ़त उसी की है

होता है हर किसी पे उसी का गुमाँ मुझे
लगता है हर किसी में शबाहत उसी की है

लिक्खूँ तो उस के इश्क़ को लिखना है शाइरी
सोचूँ तो ये सुख़न भी इनायत उसी की है

दर-ए-आस्ताँ कोई हो ब-ज़ाहिर सर-ए-सुजूद
लेकिन पस-ए-सुजूद इबादत उसी की है

वो जिस के हक़ में झूठी गवाही भी मैं ने दी
‘रूही’ मिरे ख़िलाफ़ शहादत उसी की है