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महोपनिषत् / द्वितीयोऽध्यायः / संस्कृतम्‌

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अलसा रही थी निशा सुन्दरी ‘मधुप’ कवि,
पल्लव दलों के दल डोनले लगे थे कुछ।
झोंके मंद शीतल समीर सज के समोद,
मानव हृदय को टटोलने लगे थे कुछ।।

घोलने लगे थे श्रवणों में रस तोल-तोल,
मधुर स्वरों में खग बोलने लगे थे कुछ।
सोए हुए शांति से सरांे में सकुचे सरोज,
धीरे से नयन-पट खोलने लगे थे कुछ।।

ध्यान हुआ एक प्रिय भक्त की कुटीर यहीं
प्रेम में समोद शबरी के सनने चले।
बलकल-वसन सँवार चलने को साथ,
आयुस दो भ्रात ये लखन भनने चले।।

छत्र बन छा गए विविध बादलों के दल,
आगे स्वर्ण-रश्मियों के तान तनने चले।
नयनाभिराम सुख धाम रामचन्द्र आज,
भक्ति भावना के मेहमान बनने चले।।

आए हैं अतिथि शबरी के जगदीश आज,
जीवन सफल, परिताप लय हो गए।
हो ही गई पूर्ण चिर साध अनुरागिनी की,
श्रुति सुधा सिंचित अमृतमय हो गए।।

कैसे करूँ प्रकट रहस्य दवि-माधुरी का,
दिव्यता विलोक, अलकेश नय हो गए।
जाग उठी जागृति की ज्योति शबरी के गृह,
मानो रवि एक, दूसरे उदय हो गए।।

देख जगदीश को विराजे कुटिया में आज,
जीवन सराहा, हरषा के हूमने लगी।
खोई हुई मानों निधि पाकर प्रमोद भरे,
अंक में छिपा कर निशंक घूमने लगी।

पोंछ पलकों से ले कुशासन बिछाया शीघ्र,
आदर से आरती उतार झूमने लगी।
दीन दुखभंजन, स्वभक्त मन रंजन के
बार-बार चाव से चरण चूमने लगी।।

आया चेत बोली क्या अतिथि-सत्कार करूँ,
होगे निराहार आज हो गई बहुत देर।
बीन के रखे थे कुछ बेरी शीघ्र लाई दौड़,
पावो भगवान कहा कोशलेश दिश हेर।।

देने लगी चाव से मधुर चाख-चाख जिन्हें
खाते राम, हँसते लखन देख मुँह फेर।
कौन-सी मिठास से भरे थे शबरी के बेर,
खाते न अघाते बेर-बेर मांगते थे बेर।।