भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

माल मस्त कोई खाल मस्त कोई रोणे मैं कोई गाणे म्हं / हरीकेश पटवारी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

माल मस्त कोई खाल मस्त कोई रोणे मैं कोई गाणे म्हं
खुद मस्ती मैं मस्त रहो चाहे कोई कुछ करो जमाने म्हं
कोई अनुरागी कोई त्यागी कोई बल और धन म्हं मस्त कोई
कोई ज्ञानी कोई ब्रह्मज्ञानी खल मूर्खपण म्हं मस्त कोई
रज्या मरै कोई-कोई बरत करै और पौ भर अन्न म्हं मस्त कोई
झक मारै कोई बक मारै रह मोनी मन म्हं मस्त कोई
कोई घर कोई बण म्हं मस्त कोई अलमस्त फकीरी बाणे म्हं

पाप करै कोई जाप करै हर के गुण गाकै मस्त रहै
गुरुद्वारे अंदर कोई मस्जिद अंदर जाकै मस्त रहै
घरबारी कोई ब्रह्मचारी कोई राख रमाकै मस्त रहै
लठधारी कोई मठधारी कोई धूणा लाकै मस्त रहै
कोई जटा बढ़ाकै मस्त रहै कोई राजी मूंड मुंडाणे म्हं

कोई नशे म्हं कोई विषे म्हं खोदे धन माया सारी
पड़ी चढ़ी का घटी बढ़ी का पता नहीं पता मस्तैं भारी
मगन रहै कोई नगन रहै कपड़े मैं मस्त कपड़धारी
कोई रहै लटपट कोई खटपट खोपरी की मत न्यारी
कोई पुरुष से बणता नारी राजी भेष जनाने म्हं

कोई-कोई पेट्टू पेट का टट्टू पीण खाण म्हं मस्त रहै
कोई भसूरा मूर्ख पूरा आण जाण म्हं मस्त रहै
हो निर्बल वो खल जो बोझ ठाण म्हं मस्त रहै
मुंह बावै ना गाणा आवै फेर गाण म्हं मस्त रहै
“हरिकेश” यूं ही मस्त रहा सदा पिलसण कलम घिसाणै म्हं