भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

मावां ते धियां रल बैठियाँ नी माये / पंजाबी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

मावां ते धियां रल बैठियाँ नी माये ,
कोई कर दियाँ कोल कलाप
नि कनका लमियाँ धियां क्यूँ जामियाँ नी माये ,
मावां ते धियां दी दोस्ती नी माये ,
कोई टूट दी ए कैहरां दे नाल ,
नि कनका लमियाँ धियां क्यूँ जामियाँ नी माये ,
कनका निसृयाँ धियां विसृयाँ

दूरों ते आये सां चल के नी माये ,
तेरे दर विच रहीयां खलो ,
वीरन न पूछिया सुख सूनेहा माये ,
भाभियाँ ने दिता न प्यार ,
नि कनका लमियाँ धियां क्यूँ जामियाँ नी माये ,
कनका निसृयाँ धियां विसृयाँ

डोली नू आयीं अर्का नी माये ,
मेरे सालू नू आया नी लंगार ,
आगे तां मिलदी सी नित नी माये ,
हूँ दित्ता इ कानू बिसार ..
नि कनका लमियाँ धियां क्यूँ जामियाँ नी माये ,
कनका निसृयाँ धियां क्यूँ बिसृयाँ माये ....

कोठे ते चढ़ के वेखदी नी माये ,
कोई वेखदीयां वीरे दा राह ,
दूरों तां वेखन मेरा वीर पया आये ,
मेरे आया इ साह विच साह ,
नि कनका लमियाँ धियां क्यूँ जामियाँ नी माये ,
कनका निसृयाँ धियां क्यूँ बिसृयाँ माये ....

जींद निमानी पाये होक्के भरदी ,
तेरे बिना मेरा कोई न दर्दी...
कनका लमियाँ नी धियां क्यूँ जामियाँ नी माये ,
कनका निसृयाँ धियां क्यूँ बिसृयाँ माये ....
 
बूए ते बहिंदी आँ सामणे नी माये ,
नी मैं लवां भरावां दा नाम ,
कनका लमियाँ नी धियां क्यूँ जामियाँ नी माये ,
 कनका निसृयाँ धियां क्यूँ बिसृयाँ माये ....
 
किसे गवान्डन ने दसया नी माये,
के तेरा आया ए पियु ते भराह ,
मन विच आया कि छेड़दियाँ नी माये ,
मेरे हाँ नू लगिय इ च ,
कनका लमियाँ नी धियां क्यूँ जामियाँ नी माये ,
कनका निसृयाँ धियां क्यूँ बिसृयाँ माये ....
 
भाभियाँ वांग सहेलियां नी माये ,
मेरे वीरान दी तनदी चानण ,
भाभियाँ मारण जन्द्रे नी माये ,
मेरा हुन कोई दावा वी न,
कनका लमियाँ नी धियां क्यूँ जामियाँ नी माये ,
कनका निसृयाँ धियां क्यूँ बिसृयाँ माये ....

मिटटी दा बुत में बनऔनी माये ,
उसदे गल लग के रोनीयाँ
मिट्टी दा बुत न बोल्दा नी माये
ओहदे गल लगन दा हाल कहाँ ,
कनका लमियाँ नी धियां क्यूँ जामियाँ नी माये ,
कनका निसृयाँ धियां क्यूँ बिसृयाँ माये ....