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मिथिस्टोरिमा-1 / ग्योर्गोस सेफ़ेरिस

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मिथिस्टोरिमा : इस समास शब्द के बारे में सेफ़रिस का कहना है कि यह शब्द ’मिथ’ (मिथक) और ’हिस्ट्री’ (इतिहास) से मिलकर बना है।

हमारा देश एक परिवृत स्थान है, सर्वत्र पर्वत
और पर्वतों पर एक निचले आकाश की छत, दिन और रात ।
हमारे यहाँ नदियाँ नहीं हैं, हमारे यहाँ कुएँ नहीं हैं, हमारे यहाँ निर्झर नहीं हैं,
केवल कुछ हौज हैं, ख़ाली ; वे बजते हैं और हमारे लिए
पूजा की चीज़ हैं ।

एक स्थिर नाद, खोखला, हमारे अकेलेपन की तरह ।
हमारे प्रेम की तरह और हमारे शरीरों की तरह ।
यह हमें विचित्र लगता है कि कभी हम समर्थ थे इन
अपने घरों का निर्माण करने में, इन झोपड़ियों, इन भेड़-शालाओं का ।
और हमारे विवाह, -- ओसभरी मालाएँ, परिणय उँगलियाँ,
हमारी आत्माओं के लिए अबूझ पहेली हो गई हैं ।
कैसे वे जन्मे
हमारे बच्चे ? कैसे तब वे बड़े हुए ?

हमारा देश एक परिवृत स्थान है । यह घिरा हुआ है
दो काली ’टकराती चट्टानों’ से । और जब हम रविवार को
बन्दरगाह पर नीचे जाते हैं हवा में साँस लेने के लिए,
हम देखते हैं, सूर्यास्त से चमकती,
अधूरी यात्राओं की टूटी हुई शहतीरें,
शरीर जो अब नहीं जानते कैसे प्रेम करना ।