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मुखौटे / शंख घोष / सुलोचना वर्मा / शिव किशोर तिवारी

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तब, जब सब सो जाते
दु:खीजन जग उठता।
आसमान आँखों के आगे झूले
नीचे शहर झूलता, और मकान
तारों जैसे एक दूसरे से मिलते हैं –
रात्रिकाल का निर्जन रस्ता,
गालों पर आँसू की लम्बी रेखा जैसा
समय तैरता जलस्रोत पर,
और
सब कोई जब सोते हों, तब
दिन के मुखौटे उतारकर रख
हिम्मत करके सच्ची-सच्ची बोल।

मूल बंगला से अनुवाद : सुलोचना वर्मा और शिव किशोर तिवारी

(‘मूर्ख बड़ो, सामाजिक नय’ (1974) नामक संग्रह में संकलित, कविता का मूल बांग्ला शीर्षक - मुखोशमाला)