भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

मुझसे पुरुषों की बात मत करो / मुइसेर येनिया

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मेरी आत्मा इतनी दुखती है
कि मैं धरती के भीतर सोए पत्थरों को जगा देती हूँ

मेरा स्त्रीत्व
एक गुल्लक है जिसमे भरे हैं पत्थर
एक घर कीड़े-मकोड़ों का, कठफोडवों का
एक गुफा चढ़ते-उतरते भेड़ियों के लिए
मेरी देह पर, मेरी बाँहों पर
नए बीज बिखेरे जाते हैं
तुम्हारे जीवन के लिए पुरुष तलाशा जाता है
यह बेहद गम्भीर मसला है

मेरा स्त्रीत्व, मेरा ठण्डा नाश्ता
और मेरा वस्ति प्रदेश, खालीपन से भरा एक घर
इसी पर टिकी है यह दुनिया
और तुम ! उस गन्दगी के साथ जी रही हो
जो फेंक दी गई है तुम्हारे अन्दर

जब वह जा चुके, उससे कहना
कि नाख़ून छूट जाते हैं माँस में
कि तुम जीती हो इस टूटन की विज्ञान के साथ
उस गम्भीर बीमारी के बारे में उसे बताना

किसी भेड़ के चमड़े की तरह, मैं ठण्डी हूँ तुम्हारी घूरती निगाह में
मैं तुम्हारी माँ की कोख की कर्ज़दार नहीं हूँ , श्रीमान !
मेरा स्त्रीत्व, मेरा अधीनित महाद्वीप

और न मैं खेती वाली जमीन हूँ ...
खरोंच कर मिटा दो उस अंग को जो मेरा नहीं
साँप की केंचुल की तरह, काश मैं उससे मुक्त हो सकती
हत्या के लिए माँ बने रहना तार्किक नहीं

यह टुकड़ों में विभाजित सरज़मीन नहीं
एक स्त्री की देह है
अब मुझसे पुरुषों की बात मत करो !