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मुझे अब बुढ़ापे की आदत हो गई है / नाज़िम हिक़मत / यादवेन्द्र

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 मुझे अब बुढ़ापे की आदत हो गई है
यह दुनिया की सबसे कठिन कला है...
दरवाज़े पर ऐसे दस्तक देना जैसे ये आख़िरी बार हो
और अब बिछुड़ना आसन्न हो।

घण्टों...तुम...बहो...बहते रहो...बहते रहो...
भरोसे को दाँव पर रख कर
मैं कोशिश कर रहा हूँ कि समझ सकूँ सारा माजरा।
 
तुमसे बहुत कुछ कहने को मन में था
पर कहना सम्भव हुआ नहीं।

जैसे कि मेरी दुनिया के अन्दर बसा हुआ
सुबह सबेरे की सिगरेट का स्वाद...
मृत्यु ख़ुद आने से पहले ही भेज चुकी है
मेरे पास अपना हरकारा अकेलापन।

मुझे उन तमाम लोगों से जलन होने लगी है
जिनको इल्म ही नहीं है कि वे बूढ़े हो रहे हैं
और गहरे जुड़ाव के साथ लगनपूर्वक
जुटे हुए हैं अपने काम में आदतन।

अँग्रेज़ी से अनुवाद — यादवेन्द्र