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मुझे नहीं मालूम, बंधु कब से / ओसिप मंदेलश्ताम

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मुझे नहीं मालूम, बन्धु, कब से
लोग गीत यह गाने लगे
पंख फड़फड़ाएँ अपराधी सुनकर जिसे
औ' निजाम भुनभुनाने लगे

मैं चाहूँ फिर से बस यूँ ही
सिर्फ़ एक बार करना कुछ बात
जलती अग्नि का स्वर सुनना चाहूँ
और दूर ढकेल देना यह रात

घास काटना चाहूँ फिर से मैं
औ' टोप उड़ाना दुखदायी पवन का
अंधेरा बन्द छिपा बैठा जहाँ
फाड़ देना चाहूँ वह बोरा गगन का

ताकि फिर घन्टे-सा बजे रक्त हमारा
और उखड़ी-सूखी घास भी करे इंकार
चाहे एक सदी बाद मिले फिर हमें वापिस
चोरी गए हमारे सारे सपनों का अम्बार

रचनाकाल : 1922