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मुट्ठी भर बाँधकर / रमेश रंजक

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मुट्ठी भर बाँधकर इरादे
बाहों भर तोड़कर क़सम
गीतों के रेशमी नियम जैसे-
वैसे ही टूट गए हम

यह जीवन
धूप का कथानक था
रातों का चुटकला न था
पर्वत का
मंगलाचरण था यह
पानी का बुलबुला न था

आँगन का आयतन बढ़ाने
बढ़ने दो-चार सौ क़दम
हमने दीवार की तरह तोड़ी
परदों की साँवली शरम
मुट्ठी भर बाँधकर इरादे...