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मुश्किल ये दौर काट ज़रा इत्मिनान में / शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

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मुश्किल ये दौर काट ज़रा इत्मिनान में
होती है कामयाबी नेहां इम्तहान में

कितनी बुलंदियों को छुओगे उड़ान में
मंज़िल कोई बनी ही नहीं आसमान में

नफ़रत, एनाद, बुग़्ज़, तआस्सुब, अदावतें[1]
ख़तरे कई तरह के है अम्नो-अमान में

इस रहगुज़र में ऐसे भी कुछ हमसफ़र मिले
पाया बहुत सुकून सफ़र की थकान में

शाहिद तलाश जिनकी थी वो ही न मिल सके
अपने बहुत मिले हैं मगर इस जहान में

शब्दार्थ
  1. (नफ़रत, एनाद, बुग़्ज़, तआस्सुब, अदावतें- सब एक ही कुनबे से हैं)