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मेरा दिल / मंगलेश डबराल

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एक दिन जब मुझे यक़ीन हो गया
कि मेरा दिल ही सारी मुसीबतों की जड़ है
इस हद तक कि अब वह ख़ुद एक मुसीबत बना हुआ है
मैं उसे डॉक्टर के पास ले गया
और लाचारी के साथ बोला — डॉक्टर ! यह मेरा दिल है
लेकिन यह वह दिल नहीं है
जिस पर मुझको कभी नाज़ था[1]

डॉक्टर भी कम अनुभवी नहीं था
इतने दिलों को दुरुस्त कर चुका था
कि ख़ुद दिल के पेशेवर मरीज़ से कम नहीं लगता था
उसने कहा तुमने ज़रूर मिर्ज़ा ग़ालिब को ग़ौर से पढ़ा है
मैं जानता हूँ यह एक पुराना दिल है
पहले यह पारदर्शी था, लेकिन धीरे-धीरे अपारदर्शी होता गया
और अब उसमें कुछ भी दिखना बन्द हो गया है
वह भावनाएँ सोखता रहता है और कुछ प्रकट नहीं करता
जैसे एक काला विवर सारी रोशनी सोख लेता हो
लेकिन तुम अपनी हिस्ट्री बताओ ।

मैंने कहा — जी हाँ, आप शायद सही कहते हैं
मुझे अक्सर लगता है, मेरा दिल जैसे अपनी जगह पर नहीं है
और यह पता लगाना मुश्किल है कि वह कहाँ है
कभी लगता है, वह मेरे पेट में या हाथों में चला गया है
अक्सर यही भ्रम होता है कि वह मेरे पैरों में रह रहा है
बल्कि मेरे पैर नहीं यह मेरा दिल ही है
जो इस मुश्किल दुनिया को पार करता आ रहा है ।

डॉक्टर अपना पेशा छोड़कर दार्शनिक बन गया
हाँ-हाँ — उसने कहा — मुझे देखते ही पता चल गया था
कि तुम्हारे जैसे दिलों का कोई इलाज नहीं है
बस, थोड़ी-बहुत मरम्मत हो सकती है, कुछ रफू वगैरह
ऐसे दिल तभी ठीक हो पाते हैं
जब कोई दूसरा दिल भी उनसे अपनी बात कहता हो
और तुम्हें पता होगा, यह ज़माना कैसा है
इन दिनों कोई किसी से अपने दिल की बात नहीं कहता
सब उसे छिपाते रहते हैं
इतने सारे लोग लेकिन कहीं कोई रूह नहीं
इसीलिए तुम्हारा दिल भी अपनी जगह छोड़कर
इधर-उधर भागता रहता है, कभी हाथ में, कभी पैर में ।

शब्दार्थ
  1. मिर्ज़ा ग़ालिब का शेर : ‘अर्ज़े नियाज़े इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा, जिस दिल पे मुझको नाज़ था वो दिल नहीं रहा’