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मेरी निगह के रह पे फ़र्ख़ंदा फ़ाल चल / वली दक्कनी

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मेरी निगह के रह पे फ़र्ख़ंदा फ़ाल चल
है रोज़-ए-ईद आज ऐ अबरू हिलाल चल

तेरी नयन की दीद कूँ ऐ नूर-ए-हर नज़र
शक नईं अगर ख़तन सिती आवें ग़ज़ाल चल

मुमकिन नहीं है तन की तरफ़ उसकी बाज़गश्‍त
जो दिल गया है दिलबर-ए-दिलकश की नाल चल

पीतम की ज़ुल्‍फ़-ए-पेच दिसा मुझ सवाद-ए-हिंद
इस राह-ए-मार बीच में ऐ दिल सम्‍हाल चल

वहदत के मैकदे में नहीं बार होश कूँ
उस बेख़ुदी के घर की तरफ़ सुध को डाल चल

ऐ बेख़बर अगर है बुज़ुर्गीं की आरज़ू
दुनिया की रह गुज़र में बुज़ुर्गां की चाल चल

गर आकिब़त की मुल्‍क की ख्‍व़ाहिश है सल्‍तनत
खुशख़स्‍लती के मुल्‍क में ऐ ख़ुशख़साल चल

आया तिरी तरफ़ जो 'वली' तो अजब नहीं
आते हैं तुझ गली मिनीं साहिब कमाल चल