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मेरी पत्नी की चिट्ठी / नाज़िम हिक़मत

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मैं तुमसे पहले मरना चाहती हूँ।
 
क्या तुम्हें लगता है कि बाद में मरने वाला
पा जाता है पहले मरने वाले को?
मुझे तो ऐसा नहीं लगता।

बेहतर होगा कि मुझे जला देना
और रख देना अपने आतिशदान के ऊपर
एक मर्तबान में।
 
मर्तबान साफ़ शीशे वाला हो,
ताकि तुम देख सको मुझे भीतर...

देखो मेरी कुर्बानी :
मैनें छोड़ दिया धरती होना,
तज दिया फूल होना,
सिर्फ़ तुम्हारे पास बने रहने के लिए

और मैं राख हो गई
तुम्हारे साथ रहने के लिए।
 
फिर, जब तुम छोड़ना यह दुनिया,
आ जाना मेरे मर्तबान में
और हम उसमें रहेंगे साथ-साथ,
तुम्हारी राख रहेगी मेरी राख के साथ,
जब तक कि कोई नासमझ नववधू
या कोई जिद्दी पोता
हमें बाहर न फेंक दे...

मगर
तब तक
हम
आपस में
ऐसे मिल चुके होंगे
कि कचरे में भी हमारे तमाम कण
अगल-बगल ही गिरेंगे
हम साथ-साथ डुबकी लगाएंँगे धरती में।
 
और अगर किसी दिन पानी पाकर कोई जंगली फूल
फूट आता है धरती के उस टुकड़े से,
तो उसकी डण्ठल में
दो कलियाँ ज़रूर होंगी :
एक तुम होओगे
और दूसरी मैं।

मैं अभी
मरने नहीं जा रही हूँ.
अभी एक और बच्चा जनना चाहती हूँ।
 
पूरी भरी हूँ मैं ज़िन्दगी से
और गर्म है मेरा खून।
 
तुम्हारे साथ
बहुत दिन ज़िन्दा रहना है मुझे, बहुत दिन।

मौत मुझे डराती नहीं,
बस अपने क्रियाकर्म के इन्तज़ाम
मुझे कुछ सोहते नहीं।
 
मगर मेरे मरने के पहले
सबकुछ बदल सकता है.
क्या तुम्हारे जेल से जल्दी निकलने की कोई गुंजाइश है?

मेरे भीतर कुछ है, जो कहता है :
शायद।

18 फरवरी 1945

अँग्रेज़ी से अनुवाद : मनोज पटेल