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मेरे जेल में आने के बाद / नाज़िम हिक़मत / उज्ज्वल भट्टाचार्य

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मेरे जेल में आने के बाद
धरती घूम चुकी है सूरज के इर्द-गिर्द दस बार
और अगर तुम धरती से पूछो, वह कहेगी :
‘कहना भी क्या,
एक मामूली सा अरसा ।’
और अगर तुम मुझसे पूछोगे, मैं कहूँगा :
‘मेरी ज़िन्दगी के दस साल ।’

मेरे पास एक पेंसिल थी
जब मैं जेल में आया ।
लिखते-लिखते घिसकर ख़त्म हो गई एक हफ़्ते में ।
और अगर तुम पेंसिल से पूछो, वह कहेगी :
‘एक समूची ज़िन्दगी ।’
 पर अगर मुझसे पूछते हो, मैं कहूँगा :
‘कुछ भी नहीं, सिर्फ़ एक हफ़्ता ।’

क़त्ल के इल्ज़ाम में उसमान को क़ैद की सज़ा मिली
मेरे यहाँ आने के बाद
सात साल की सज़ा काटकर वह वापस लौट गया ।
बाहर कुछ दिनों तक भटकता रहा,
और फिर तस्करी के आरोप में उसकी सज़ा हुई ।
छह महीने के बाद वह लौट गया,
और कल उसकी चिट्ठी आई कि उसने शादी कर ली है
और वसन्त में उसके बच्चे का जन्म होगा ।

जिस साल मैं जेल में आया
तब अपनी माँ के गर्भ से निकले बच्चे
अब दस साल के हो चुके हैं,
उस साल जन्म लेने वाली लम्बी पतली टाँगों वाली बछेड़ियाँ
अब भारी-भरकम कूल्हों वाली घोड़ियाँ बन चुकी हैं ।
लेकिन जैतून के नन्हें पौधे अब भी पौधे हैं
और अब भी वे कमसिन हैं ।

मेरे जेल में आने के बाद
दूर मेरे शहर में नए-नए चौक बने हैं ।
और हमारा परिवार
एक ऐसे घर में रहता है जिसे मैंने देखा नहीं
एक सड़क पर जिसे मैं नहीं जानता ।
मैं जब जेल में आया
रोटी कपास की तरह साफ़ सफ़ेद होती थी ।
फिर वह राशन में मिलने लगी,
और यहाँ अन्दर बैठे हम एक-दूसरे पर पिल पड़ते थे
एक बित्ता भर काले टुकड़े के लिए ।
अब वह फिर से मिलने लगी है,
लेकिन भूरे रंग की और स्वाद फ़ीका ।

जिस साल मैं जेल में आया
दूसरी लड़ाई बस शुरू ही हुई थी ।
डाखाऊ मौत शिविर की चुल्लियाँ अभी सुलगी नहीं थीं,
हिरोशिमा पर एटम बम अभी गिराया नहीं गया था ।
टेंटुआ कटे बच्चे के ख़ून की तरह समय बहता गया ।
फिर उस उनवान को सरकारी तौर पर ख़त्म कर दिया गया,
अब अमरीकी डॉलर तीसरी लड़ाई की बात करता है ।

लेकिन हर बात के बावजूद, जब से मैं जेल में आया,
दिन तो बेशक उजले हुए हैं,
कम से कम आधे लोग
‘पटरी पर और अन्धेरे की सरहद पर
अपनी हथेली जमाकर
सीधे ऊपर उठने लगे हैं ।’

मेरे जेल में आने के बाद
धरती घूम चुकी है सूरज के इर्द-गिर्द दस बार
और फिर उसी शिद्दत के साथ मैं दोहराता हूँ
जो मैंने उनके लिए लिखा था
उस साल जब मैं जेल में आया :
‘वे
जिनकी तादाद इतनी बेशुमार है
जितनी कि धरती पर चीटियाँ
पानी में मछलियाँ
आसमान में पँछी
वे डरपोक हैं और दिलेर
नादान हैं और दानिश
और वे बच्चे हैं,
और वे
जो मिटाते और बनाते हैं
मेरे इन गीतों में उन्हीं की करामातें हैं ।’

और बाक़ी सबकुछ,
मसलन, दस साल से मेरा यहाँ पड़े रहना,
यह कुछ नहीं है ...।

अँग्रेज़ी से अनुवाद : उज्ज्वल भट्टाचार्य