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मेरे पहलू में जो बह निकले तुम्हारे आँसू / 'अख्तर' शीरानी

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मेरे पहलू में जो बह निकले तुम्हारे आँसू,
बन गए शामे-मोहब्बत के सितारे आँसू ।

देख सकता है, भला, कौन ये प्यारे आँसू,
मेरी आँखों में न आ जाए तुम्हारे आँसू ।

अपना मुँह मेरे गिरेबाँ में छुपाती क्यों हो,
दिल की धड़कन कही सुन ले न तुम्हारे आँसू ।

साफ़ इकरारे-मोहब्बत हो जबाँ से क्योंकर,
आँख में आ गए यूँ शर्म के मारे आँसू ।

हिज्र[1] अभी दूर है, मै पास हूँ, ऐ जाने-वफ़ा,
क्यों हुए जाते है बैचेन तुम्हारे आँसू ।

सुबह-दम[2] देख न ले कोई ये भीगा आँचल,
मेरी चुगली कही खा दें न तुम्हारे आँसू ।

दमे-रुख़सत[3] है क़रीब, ऐ ग़मे-फ़ुर्कत[4] ख़ुश हो,
करने वाले है जुदाई के इशारे आँसू ।

सदके उस जाने-मोहब्बत के मैं ‘अख़्तर’ जिसके,
रात-भर बहते रहे शौक़ के मारे आँसू ।

शब्दार्थ
  1. जुदाई
  2. सुबह के वक़्त
  3. विदाई का समय
  4. जुदाई का ग़म