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मैं किसी आकुल ह्रदय की प्रीत लेकर क्या करूंगा ! / मनुज देपावत

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मैं किसी आकुल ह्रदय की प्रीत लेकर क्या करूंगा !

सिकुड़ती परछाइयाँ, धूमिल-मलिन गोधूलि-बेला !
डगर पर भयभीत पग धर चल रहा हूँ मैं अकेला !
ज़िंदगी की साँझ में मधु-दिवस का यह गान कैसा ?
मोह-बंधन-मुक्त मन पर स्नेह-तंतु-वितान कैसा ?

मरण-बेला में मिलन-संगीत लेकर क्या करूँगा ?
मैं किसी आकुल-ह्रदय की प्रीत लेकर क्या करूँगा !

सुखद सपनों से विनिर्मित, है न ये संसार मेरा !
प्रबल झंझा झकोरों में, पला है यह प्यार मेरा !
मैं जगत की वँचना के बोल कितने सह चुका हूँ !
छल प्रपँचों की तरणि की धार में मैं बह चुका हूँ !

पुनः मन का वह प्रवंचक मीत लेकर क्या करूँगा !
मैं किसी आकुल ह्रदय की प्रीत लेकर क्या करूँगा !

आज टूटे हैं युगों की, शृँखला के बंध मेरे !
गगन में गतिमान होकर, गा रहे हैं छंद मेरे !
फिर भला यह बंधनों का भार लेकर क्या करूँ मैं !
प्यार की यह मदभरी मनुहार लेकर क्या करूँ मैं !

हार हो जिसमें निहित, वह जीत लेकर क्या करूँगा !
मैं किसी आकुल-ह्रदय की प्रीत लेकर क्या करूँगा !