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मैं तिरस्कृत क्यों / मधु गजाधर

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तुम अगर
मानव शरीर की सरंचना जानते
तो समझ जाते कि...
करोड़ों शुक्राणुओं को हरा कर ,
पीछे छोड़ कर
मैं आगे बढ़ी,
'कन्या भ्रूण बनी
बेटी बन कर जन्मी ,
तुम्हारे घर
फिर मैं तिरस्कृत क्यों?

तुम अगर
धर्म प्रदत्त ज्ञान को जानते
तो समझ जाते कि...
तुम्हार पूर्वजन्मों के सत्कर्मों के
आधार पर,
'कन्यादान' का सौभाग्य देने हेतु
तुम्हें तुम्हारे ऋण से मुक्त करवाने हेतु ही
मैं जन्मी हूँ तुम्हारे यहाँ
फिर मैं तिरस्कृत क्यों?

तुम अगर
संस्कृति और संस्कार के मूल्यों को जानते
तो समझ जाते कि.....
इन मूल्यों को
एक पीड़ी से दूसरी पीड़ी तक
सुरक्षित रूप से पहुचाने का सामर्थ्य
सिर्फ मेरे पास है
फिर मैं तिरस्कृत क्यों?

तुम अगर चिकित्सा विज्ञानं को जानते,
तो समझ जाते कि
अनेक रोगों से लड़ने की शक्ति,
लम्भी आयु जीने की क्षमता
प्राकर्तिक रूप से
पुरुष की अपेक्षा स्त्री में अधिक है
फिर मैं तिरस्कृत क्यों?

तुम अगर अपनी संतान के
भविष्य का आधार जानते
तो समझ जाते कि .....
माता ही संतान की
निर्माता होती है,
कि 'नास्ति मात्र समः गुरु"
फिर मैं तिरस्कृत क्यों?

तुम अगर जीवन की सुख समृद्धि सौभाग्य का
रहस्य जानते तो
समझ जाते
कि सुख सौभाग्य केवल
माँ के आँचल में, बहन की राखी में,
पत्नी के प्रेम में और
बेटी के कन्यादान में है
फिर मैं तिरस्कृत क्यों?

तुम अगर विश्व अशांति
और
सामाजिक अपराधों का
कारण जानते,
तो समझ जाते कि
पौरुषेय उद्दंडता,अहंकार, महत्वाकांक्षा
स्वार्थी और भावनाहीन होना
बड़ा कारण है
मगर मुझ स्त्री का अस्तित्व
देता है
देश समाज को एक वज़न
परिवार को शक्ति
फिर मैं तिरस्कृत क्यों?

तुम अगर सोचते कि
इस चाहना, अपेक्षा, और मांग के
दिन प्रतिदिन बड़ा मुंह खोलते
इस युग में निस्स्वार्थ भाव कहाँ है
तो जानते कि
वो सिर्फ मैं स्त्री ही हूँ
जिसने कभी लेना नहीं जाना
जो सिर्फ देना ही जानती है
और देने में ही भोग लेती है
लेने का सुख
फिर मैं तिरस्कृत क्यों?

मैं तुम्हारे दो कुलों के सम्मान
की जिम्मेदारी लिए,
तुम्हारे वंश को बढाने का
वरदान लिए,
तुम्हारे पितरों के तर्पण का
कर्तव्य भाव लिए,
हर कदम पर तुमको
अपना कन्धा दिए
खड़ी हूँ फिर भी
फिर मैं तिरस्कृत क्यों?