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मैं बिरहणि बैठी जागूं जगत सब सोवे री आली / मीराबाई

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राग बागेश्री


मैं बिरहणि बैठी जागूं जगत सब सोवे री आली॥

बिरहणी बैठी रंगमहल में, मोतियन की लड़ पोवै|
इक बिहरणि हम ऐसी देखी, अंसुवन की माला पोवै॥

तारा गिण गिण रैण बिहानी , सुख की घड़ी कब आवै।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, जब मोहि दरस दिखावै॥


शब्दार्थ :- बिरहणी =विरहनी। पोवै =गूंथती है। रैण =रात। बिहानी = बीत गयी।