भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

मै कितना ख़ुश हूँ / नाज़िम हिक़मत / विजेन्द्र

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मै कितना ख़ुश हूँ कि दुनिया मे पैदा हुआ
मुझे उसकी रोशनी से, रोटी से, रोशनी से प्यार है
माना कि लोगो ने उसका व्यास नाप डाला
निकटतम इन्चो तक
माना कि यह सूरज का खिलौना है
पर मेरे लिए वह विशाल है कल्पनातीत
 
कल्पनातीत है उसमे भ्रमण करना
और मछलियों को, सितारों को देखना
और जो मेरे लिए अनजान हैं
तरह तरह के उन फलों को देखना

पुस्तकों में चित्रों का सहारा ले
मैं ने यूरोप की यात्रा की
इतनी ज़िन्दगी बीती
पर मुझे एशिया की मोहर लगा कोई न मिला
स्थानीय दुकानदार को और मुझे
कोई भी अमरीका में नहीं जानता

लेकिन हर जगह ही
स्पेन से चीन तक
केप आफ गुडहोप से लेकर अलास्का तक
हर किलोमीटर पर
हर समुद्री मील पर
हमारे दोस्त और दुश्मन हैं

दोस्त....
उन्हें मैंने कभी नहीं देखा
फिर भी हम एक साथ मरने को उद्यत हैं
एक-सी आज़ादी पर
एक-सी रोटी पर
एक-सी उम्मीद पर
दुश्मन....
इस बड़ी फैली दुनिया में मेरी शक्ति यह है
कि मैं अकेला नहीं हूँ
पृथ्वी और उस पर रहने वाले मेरे विज्ञान के लिए रहस्य नहीं
इसलिए, प्रश्न और विस्मय के विरामचिन्हो से मुक्त होकर
मैं भी चिन्ताओं से ऊपर उठा
इस संघर्ष का सिपाही बना
उन सिपाहियों से अलग रहने पर यह पृथ्वी और तुम
मुझे सन्तोष नहीं दे सकते
फिर भी तुम कितने प्यारे लगते हो
और कितनी गर्म और ख़ूबसूरत पृथ्वी है।

अँग्रेज़ी से अनुवाद : विजेन्द्र