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यहीं उड़ रहा था वो कोहसार में / ज़ेब गौरी

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यहीं उड़ रहा था वो कोहसार[1] में ।
उसे ढूँढ़िए अब किसी ग़ार[2] में ।

वही एक गौहर[3] पड़ा रह गया
वही एक गौहर था बाज़ार में ।

उजाला ग‍इ‍इ शब की बारिश का है
अभी साया-ए-अब्र-ओ-अशजार[4] में ।

मेरी दोनों आँखें खोली छोड़ दीं
ये कैसा चुना मुझको दीवार में ।

तो क्या तू भी गुम था मेरि ही तरह
कहीं अपने सरवस्ता असरार[5] में ।

पड़े होंगे औराक-ए-दिल[6] भी कहीं
इन्हीं ज़र्द पत्तों के अंबार[7] में ।

अजब रंग चमका है उस फूल का
मगर जब खिला शाख़-ए-इज़हार[8] में ।

उठी एक मौज-ए-सराब[9] और मुझे
बहा ले गई सब्ज़ अनवार[10] में ।

ग़ज़ल ने भरी थी उड़ान इक ज़रा
कि फिर गिर पड़ी कूचा-ए-यार[11] में ।

शब्दार्थ
  1. पहाड़
  2. गुफ़ा
  3. मोती
  4. पेड़ों और बादलों का साया
  5. गुप्त राज
  6. दिल के पन्ने
  7. ढेर
  8. अभिव्यक्ति की टहनी
  9. मरीचिका की लहर
  10. हरा-भरा ढेर
  11. यार की गली