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यही है आख़िरी पन्ना / रवीन्द्र दास

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यही है आख़िरी पन्ना
यहीं तक मैं बिखर पाया
कि लाऊंगा नई कॉपी, अगर मैं लौट कर आया
अगर ख़्वाहिश-गुबारों से मेरा मन थक गया होता
तो फिर क्या था
कभी करता नहीं कोशिश सफल एक आत्महत्या की
कि यह सौभाग्य है मेरा
जो अन्तिम पृष्ठ तक पहुँचा

तुझे मैं चाहिए तो था
न, पर, मेरी ज़रूरत थी
ज़रूरत थी यही कि मैं तेरे हिस्से में आया था
यहाँ जो सार्थक कुछ है,
वही साहित्य का टुकडा
अगर मैं बन गया तो फिर मुझे तुम खूब पाओगे
मेरा जीवित,
तेरा जीवन-नई इक सृष्टि रच लेंगे
तभी 'गर आखिरी पन्ना
बने जो पृष्ठ पहला तो
कहोगे क्यों गए यह दाग देकर,
जो सुवासित है?
मगर फिर आ न पाऊंगा
सवारी खोजता-सा मैं!