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यह ज़मीं प्रिय वो नहीं जिसके लिए घर से चला था / शार्दुला नोगजा

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यह ज़मीं प्रिय वो नहीं जिसके लिए घर से चला था
यह नहीं सरिता सजल जिसके लिए पर्वत गला था ।
बेच आया छन्द कितने, जीत आया द्वंद कितने
पर विजय केशव न ये जिसके लिए राधेय छला था ।

यह ज़मीं प्रिय वो नहीं …

मैं रहा मैं और मेरा है मुझे अब तक ममेतर
यह नहीं वह चेतना जिसके लिए तिल-तिल जला था ।
देख नन्हें श्रमिक का दुख हाय ! मैं हतप्रभ खड़ा हूँ
सीमित यहीं संवेदना जिसके लिए कवि-पथ वरा था ?

क्यों नहीं मैं सूर्य सा जल
या धवल हिम-खण्ड सा गल
इस जगत के काम आता
अंकुर उगाता !

या दलित की आँख में ढल
आह बन कर निर्धनों की
संग उनके गीत गाता
अर्थ पाता !

जब भी उठा था दान को किसने पकड़ कर कृपण कर मेरा धरा था ?
ये ही भविष्यत् का सुखन जिसके लिए संचय करा था ?
यह ज़मीं प्रिय वो नहीं जिसके लिए घर से चला था
यह नहीं वह बीज जिसके लिए गुल हँस-हँस झरा था ।

औेर लोगों पे मलूँ क्यों
अपने हृदय की लीक कालिख
काश! इसको धो मैं पाता
गंगा नाहाता !

या कि बन कार्बन सघन
कोयले से ले आतिश जलन
पाषाण से मैं घात पाता
चमक जाता !

"किस्से कहानी की ये बातें, सत्य ये होतीं नहीं हैं ”
क्या झूठ थे वे सब कथानक जिनको बचपन में सुना था ?
यह ज़मीं प्रिय वो नहीं जिसके लिए घर से चला था
यह नहीं उपवन हरित जिसके लिए मरूथल जला था ।

काश ! एक दिन वन्दना में
ईश का कर ध्यान पाता
खुद को मिटाता
जी मैं जाता !