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याद / महेंद्रसिंह जाडेजा

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घर के छप्पर से निकलकर
बादल के साथ मिलता धुआँ
और घाटी में बहते रहते
छोटे-छोटे झरने
लाल-लाल झरबेरियों से
लदा हुआ पेड़
और
सूर्य को छिपाने की कोशिश करते
बाँस के जंगल...

इस साल भी मुझे
जब मैं पीलू के तने से
टिककर बैठा
तब उसकी याद
हिरनी की तरह दौड़ कर आई ।


मूल गुजराती भाषा से अनुवाद : क्रान्ति