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यूँ ही नहीं सुर्ख़़ हैं / विकि आर्य

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यूँ ही नहीं सुर्ख़़ हैं
ये चटख़ी हुई,
दिल्ली की चट्टानें !
नहाई है लहू में,
सुलगती रहीं युद्धों में
न जाने कब से...
कितनी बार...