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यू०पी०एस०सी० के बस-स्टॉप पर बैठी एक लड़की / लीना मल्होत्रा

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यू०पी०एस०सी० के बस-स्टॉप पर बैठी एक लड़की
मानो जड़ हो गई है
कोई बस नहीं पकड़ी उसने पिछले तीन घंटे से

या तीन शताब्दियों से
पढ़ने की कोई कोशिश भी नहीं की किसी बस का नम्बर
बस सोचे चली जा रही है
अनंत विस्तार वाली किसी सड़क पर निकल गई है उसकी चेतना
अफ़्रीका के घने जंगलों में शायद खो गई हैं उसकी स्मृतियाँ

कितने ही लोगों की जलती निगाहे उसकी ग्लेशियर बनी दृष्टि से टकरा कर वाष्पीकृत हो गई हैं

हर कोई बस में चढ़ने से पहले पूछना चाहता है उससे
माजरा क्या है
क्यों बैठी हो ऐसे
क्या किसी परीक्षा का परिणाम आ गया है

डर रही हो घर जाने से
पर नहीं
इस उम्र में असफलताएँ नहीं बदलती किसी को बुत में ।
   
तो क्या वह प्रतीक्षा कर रही है किसी की
क्योंकि एक सन्नाटा उसकी पेशानी पर बैठा हाँफ रहा है
या विदा कह दिया है किसी ने उसको या उसने किसी को

क्योंकि उसकी आँखों के भूगोल में पैबस्त है एक उम्मीद
किसी के लौट आने की
या किसी तक लौट जाने की
उसके हाथ में है एक ख़ामोश मोबाइल
उसमे शायद किसी का संदेसा है जिसने उसके लम्हों को सदियों में बदल दिया है ।

क्योंकि उसकी उँगलियों में बची है अभी तक ऊर्जा
जो धीमे-धीमे सहला रही है मोबाइल की स्क्रीन को
मानो उस दो इंच क्षेत्रफल में ही वह भूल-भुलैय्या दफ़न है
जिसमे कोई खो गया है
और साथ ही वह भी खो गई है उसे ढूँढ़ते हुए...

क्या सोच रही है वह
कोई नहीं जानता
उसकी सोच किले की दीवारों की तरह आकाश तक पसरी है
वह है कि सोचे चली जा रही है

बिना मुस्कुराए
बिना रोए
बेख़बर
बस, सोचे ही चली जा रही है