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ये जो सपने हैं / हरीश भादानी

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ये जो सपने हैं-
सुबह की सीटियों के बाद
क्या अस्तित्व है इनका ?
शहरी नींद में
बेहोश मन के पास
रात की तिरती हुई यह झील
अनकहीं
कहती रही सी
तरलाई-फैली हुई आँखें;
घोंसलों के अधखुले झरोखों तक
कड़वा धुँआ आने के बाद
क्या अस्तित्व है इनका ?
संकरी गली से दूर
गहगहाते से उषाई रंग
महमहाती गंध
डोलते सारंग
आकाश की उल्टी अँगीठी से-
हवाएं सोख,
बिछती धूप से
कुढते धुंधले तक
क्या अस्तित्व सपनों का ?