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ये फ़ैसला मेरा न था जो इस तरफ़ आना हुआ / रवि सिन्हा

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ये फ़ैसला मेरा न था जो इस तरफ़ आना हुआ
हैरत किसे है जो मैं इस कूचे से बेगाना हुआ

जिस ख़ाक से उभरा हूँ उसपर हुक्म क़ुदरत का चले
जिस जिस्म में हूँ वो अनासिर[1] का सनम-ख़ाना[2] हुआ

जो इस मशीन में भूत है पैदा हुआ है मशीन से
मैं मकीं[3] हुआ के मकाँ हुआ या सिर्फ़ अफ़साना हुआ

मेरा वजूद है आरज़ी[4] इस दास्ताने-तवील[5] में
वो हबाब[6] हूँ जो दहर[7] के होने का पैमाना हुआ

क्या पूछते हो हाल क्यूँ ढूँढे फिरे हो सबब यहाँ
वज्हे-जुनूँ की तलाश में वो शख़्स दीवाना हुआ

हर ख़िश्त[8] में मंतिक़[9] हक़ीक़त फ़र्श में दीवार में
यूँ देखिये ख़्वाबो-तख़य्युल[10] का ये बुत-ख़ाना हुआ

देखो कहानी मुख़्तसर कुछ यूँ न हो जाये कहीं
बस बेवजह आना हुआ और नागहाँ[11] जाना हुआ

शब्दार्थ
  1. तत्व, पंचभूत (elements)
  2. मन्दिर (temple)
  3. रहने वाला (resident)
  4. क्षणिक (temporary)
  5. लम्बा (long)
  6. बुलबुला (bubble)
  7. काल, युग, जगत (Time, Era, World)
  8. ईंट (brick)
  9. तर्क (logic)
  10. कल्पना (imagination)
  11. अचानक (suddenly)