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ये रंग है सुबोह का के कोई रंग नहीं आज / नीना कुमार

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मग़लूब[1] फलक पर है कोई जंग नहीं आज
शमशीर-ए-बर्क[2] की कोई तरंग नहीं आज

बादलों को हुई है मुक़म्मल फ़तेह हासिल
ये रंग है सुबोह का के कोई रंग नहीं आज

दिल दहलाती गरज, न वो गैज़ो-ग़ज़ब[3] है,
न जिगरे-फलक चाक, समा दंग नहीं आज

चादर है शम्स पर, मौसमे-अब्र की कुछ यूँ
चश्मे-नम की हुकूमत भी है तंग नहीं आज
 
फ़क़त अश्कों का मजमा, सब्ज़े-ज़ख्म में ठहरा
जश्ने-जीत शिकस्ता, के हौसले संग नहीं आज
 
मेरी दश्ते-ख़ामोशी का भी हाल है कुछ यूँ
के उड़ाने को उम्मीदों की पतंग नहीं आज

महफूस जहां से था, एक गोशा-ए-आफ़ीय्यत[4]
जाती थी वहाँ तक, क्या वो सुरंग नहीं आज

क्यों ये ज़ब्त है आया, क्यों कहर नहीं ढाया
क्यों कलम-ओ-जुबां मेरी, है दबंग नहीं आज

ऐसा तो नहीं है, मो'जिज़ा[5] देखा नहीं हमने
हाल ये है पर 'नीना', हैरते-नैरंग[6] नहीं आज

नीना कुमार (20 जुलाई 2013)

शब्दार्थ
  1. हारे हुए
  2. बिजली की तलवार
  3. प्रकोप; उग्रता और रोष
  4. एक निजी कोना
  5. चमत्कार
  6. जादू, जादूगरी